About · परिचय
परिचय
यह एक व्यक्ति का अभिलेखागार है, स्मारक नहीं। इसका उद्देश्य चौधरी मुल्तान सिंह वर्मा तथा गूजर विद्या प्रचारिणी सभा से सम्बन्धित सामग्री एक जगह इकट्ठा करना, उसका स्रोत बताना, और यह स्पष्ट रखना है कि किस बात के पीछे दस्तावेज़ है और किसके पीछे केवल स्मृति।
हितों की घोषणा
यह संग्रह उनके पौत्र विनय वर्मा द्वारा संचालित है — सम्पर्क vinayverma5@gmail.com। पारिवारिक सम्बन्ध सामग्री तक पहुँच देता है, प्रमाण नहीं। इसी कारण दावों पर सबसे कड़ा नियम लगाया गया है।
यह संग्रह क्यों
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँवों में जो शिक्षा-संस्थाएँ खड़ी हुईं, उनका अपना लिखित इतिहास प्रायः नहीं बचा। जो बचा है, वह दो रूपों में है — संस्थाओं की पत्रावलियाँ, जो बिखरी और अनुपलब्ध हैं, और स्मृति, जो पीढ़ी के साथ बदलती जाती है। इनके बीच कहीं-कहीं एक-दो पुस्तिकाएँ हैं, जो श्रद्धा में लिखी गईं और इसी कारण जाँच के बिना उद्धृत नहीं की जा सकतीं।
यह संग्रह उस अन्तर को स्वीकार करके शुरू होता है। यहाँ प्रत्येक कथन के साथ उसका स्रोत तथा प्रमाण-स्थिति दर्ज है, और जहाँ स्रोत नहीं है वहाँ रिक्त स्थान खुला छोड़ा गया है। तिथियाँ अनुमान से नहीं भरी गईं, अस्पष्ट पाठ का अर्थ नहीं गढ़ा गया, और मुद्रित असंगतियाँ चुपचाप सुधारी नहीं गईं।
इससे पृष्ठ कहीं-कहीं अपूर्ण लगते हैं। यह अपूर्णता जानबूझकर है — एक अभिलेखागार का काम कहानी पूरी करना नहीं, यह बताना है कि कहाँ तक प्रमाण है।
साक्ष्य-क्रम
सभी स्रोत समान नहीं हैं। किसी कथन का वज़न इस बात से तय होता है कि उसका स्रोत घटना से कितनी दूर है और उसका हित किस ओर है। इस संग्रह में चार श्रेणियाँ हैं, ऊपर से नीचे घटते वज़न के क्रम में।
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इस संग्रह में अब दो स्रोत सूचीबद्ध हैं — एक तीसरी श्रेणी का प्रकाशन, तथा एक प्रथम श्रेणी का शिलालेख। जहाँ दोनों एक ही तिथि देते हैं, वहाँ कथन दो स्वतंत्र स्रोतों पर खड़ा है; शेष के लिए अब भी “अंकित” ही कहा जाता है, “सिद्ध” नहीं। दोनों का पूरा विवरण सन्दर्भ पृष्ठ पर।
भाषा तथा वर्तनी
- हिन्दी इस संग्रह की मूल भाषा है; अंग्रेजी संस्करण अनुवाद है, स्वतंत्र पाठ नहीं। किसी भिन्नता की स्थिति में हिन्दी पाठ मान्य होगा।
- नाम, गाँव तथा पदनाम उसी वर्तनी में रखे गए हैं जो स्रोत में है — “मु.नगर”, “जौंड़खेड़ा”, “हैडमास्टर”, “बीघे”, “बिस्से”। आधुनिक मानक वर्तनी थोपी नहीं गई।
- तत्कालीन शब्द जहाँ आज असामान्य लगते हैं — डेपुटेशन, अन्तरंग सभा, मुस्तकिल, मौजा — वहाँ भी वही शब्द रखा गया है, क्योंकि उनका बदलना अर्थ बदल देता है।
- जातिनाम स्रोत के अनुसार, संस्थाओं तथा सभाओं के नामों में ही आते हैं; उन्हें हटाना ऐतिहासिक विवरण को अस्पष्ट कर देगा।
सीमाएँ
- विवरण का पूरा ढाँचा अब भी एक ही स्रोत से आता है — संस्था के भीतर से लिखी पुस्तिका। शिलालेख उससे स्वतंत्र है, परन्तु वह केवल तिथियों की पुष्टि करता है, घटनाओं का क्रम अथवा कारण नहीं देता। पुस्तिका की प्रशंसात्मक भाषा यहाँ नहीं दोहराई गई, परन्तु उसका चयन-पक्ष अब भी इस संग्रह में मौजूद है।
- उस स्रोत का विवरण मुख्यत: विषय-व्यक्ति के अपने कथन पर आधारित है, जैसा उसके प्राक्कथन में लिखा है। इससे वह प्रत्यक्ष तो होता है, परन्तु स्वतंत्र नहीं — अपने ही विषय में दिया गया विवरण स्वयं की पुष्टि नहीं करता।
- जन्म तथा निधन की तिथि अब शिलालेख से दर्ज है (12 अगस्त 1900 तथा 16 जनवरी 1983), परन्तु जन्म-वर्ष पर पुस्तिका से तीन वर्ष का विरोध बना हुआ है। इससे 1910, 1915 तथा 1917 के शिक्षा-वर्षों का क्रम भी अनिश्चित हो जाता है। विरोध
- पुस्तिका के पृष्ठ 1 का पाठ अभी नहीं उतारा गया, अतः शीर्षक-पृष्ठ का प्रकाशन-विवरण अपूर्ण है। शेष पढ़े गए पृष्ठों का पाठ दर्ज है।
- महिलाओं का उल्लेख स्रोत में अत्यन्त संक्षिप्त है — प्रथम पत्नी का नाम नहीं दिया गया, और श्रीमती पिरानी देवी सबसे बड़ी दानकर्ता होकर भी केवल तालिका में आती हैं। यह अन्तर स्रोत का है, और इसे यहाँ भरा नहीं गया।
- कोई प्रतिदावा अभी दर्ज नहीं है। इसका कारण उनका अभाव नहीं, उनके पाठ की अनुपलब्धता है।
सामग्री भेजें
कागज़, फोटो, पत्र, रसीद, रजिस्टर, अथवा सुनी हुई बात — सब उपयोगी है। मूल वस्तु भेजने की आवश्यकता नहीं; स्पष्ट छायाचित्र पर्याप्त है, बशर्ते पूरा पृष्ठ किनारों सहित दिखे।
साथ में यह बताएँ
- वस्तु किसके पास थी और आपको कहाँ से मिली
- यदि मौखिक विवरण है — किसने बताया, किस वर्ष के आसपास, और वे स्वयं घटना के समय उपस्थित थे या उन्होंने भी सुना था
- आपका नाम, यदि आप श्रेय दर्ज कराना चाहते हैं; न चाहें तो वस्तु “अनामित स्रोत” के रूप में दर्ज होगी
भेजने का पता: vinayverma5@gmail.com — विनय वर्मा।
प्रत्येक प्राप्त वस्तु को पहचान-संख्या दी जाती है और उसका आने का रास्ता उसी के साथ दर्ज होता है।
संशोधन
किसी तिथि, नाम, संख्या अथवा श्रेय पर आपत्ति हो तो वह भेजी जा सकती है। जिस संशोधन के साथ दस्तावेज़ है, वह पृष्ठ पर लागू किया जाएगा; जिसके साथ नहीं है, वह भी दर्ज होगा — “आपत्ति, प्रमाण अपेक्षित” के रूप में।
परिवर्तन चुपचाप नहीं किए जाते। पुराना पाठ मिटाने के बजाय बदलाव का कारण दर्ज किया जाता है, जिससे यह देखा जा सके कि यह संग्रह समय के साथ किस दिशा में बदला।
आपत्ति अथवा संशोधन इसी पते पर भेजें: vinayverma5@gmail.com