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Institutions · संस्थाएँ

संस्थाएँ

वे सभाएँ, विद्यालय तथा छात्रावास जिनसे मुल्तान सिंह वर्मा का सम्बन्ध स्रोतों में दर्ज है — संस्थापक, प्रधानाचार्य, पदाधिकारी अथवा अध्यापक के रूप में। प्रत्येक प्रविष्टि में उनकी भूमिका अलग से अंकित है, क्योंकि स्थापना और संचालन एक बात नहीं है।

भूमिका का भेद

स्रोत एक ही व्यक्ति को कहीं “संस्थापक” कहते हैं, कहीं “हैडमास्टर”, कहीं “खजांची”। यहाँ वही शब्द रखा गया है जो स्रोत में है, और आगे संस्थाओं के अपने अभिलेखों से इनकी जाँच होगी। जहाँ स्रोत भूमिका स्पष्ट नहीं करता, वहाँ अनिर्दिष्ट लिखा है।

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सभाएँ

गूजर विद्या प्रचारिणी सभा, मु.नगर – सहारनपुर सर्किल

13 जून 1943
भूमिका
संस्थापक; नियमावली पहले से तैयार करके बैठक में रखी
पंजीकरण
सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट नं. 21, सन् 1860 — स्थापना के एक महीने के भीतर
प्रथम बैठक
नई मण्डी, मुजफ्फरनगर स्थित निवास; 15 व्यक्ति उपस्थित
प्रथम प्रधान
चौ. जवान सिंह बीनडा; 23 मई 1952 को चौ. धर्म सिंह पहांसू नियुक्त
स्थिति
पुस्तिका तथा शिलालेख — दोनों में 13 जून 1943

गूजर महासभा

1940–1955

गाजियाबाद अधिवेशन (1940) में खजांची नियुक्त; पुस्तिका के अनुसार 1955 तक इसी पद पर। महासभा उनसे पहले से विद्यमान थी — 1919 का सहारनपुर स्कूल तथा 1922 का रामपुर मनिहारान प्राईमरी स्कूल उसी के प्रयास थे। भूमिका: पदाधिकारी, संस्थापक नहीं।

पुस्तिका · वर्ष

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रामपुर मनिहारान की संस्था

गूजर ऐंग्लो वैदिक स्कूल → गोचर कृषि इण्टर कालेज तथा डिग्री कॉलेज, रामपुर मनिहारान

1 नवम्बर 1943

प्रारम्भ आर्य समाज मन्दिर के भवन में, 12 छात्रों के नाम तथा तीन अस्थायी अध्यापकों के साथ। शिलालेख इसे “एक छोटा सा स्कूल” कहता है, जिसे वे “डिग्री स्तर तक” पहुँचाकर सेवानिवृत्त हुए। 14 फरवरी 1944 को वे इसके मुस्तकिल हैडमास्टर बने और 30 जून 1962 तक प्रधानाचार्य रहे। अवकाश के बाद भी डिग्री कॉलेज में धर्म एवं संस्कृति पढ़ाते रहे। सन् 1982 में संस्था का नाम गोचर कृषि इण्टर कालेज, रामपुर मनिहारान था और पुस्तिका के प्राक्कथन में उन्हें उसका “भूतपूर्व संस्थापक प्रधानाचार्य” कहा गया है; नाम-परिवर्तन की तिथि तथा क्रम अभी अंकित नहीं मिला।

कक्षा-दर-कक्षा

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विस्तृत तिथियाँ तथा प्रमाण-स्थिति कालक्रम पर।

गूजर छात्रावास, नई मंडी, मुजफ्फरनगर

जुलाई 1943

सभा के प्रस्ताव सं. 5 पर किराये के मकान में खोला गया — स्कूल से चार महीने पहले। भूमिका: संस्थापक सभा के मन्त्री के रूप में।

पुस्तिका · माह तथा प्रस्ताव-संख्या

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पूर्ववर्ती प्रयास

1943 की संस्था अकेली नहीं थी। उससे पहले दो प्रयास हुए और दोनों समाप्त हो गए। यह क्रम पुस्तिका खुद देती है, अतः 1943 को “पहला स्कूल” कहना स्रोत के विरुद्ध होगा।

गूजर स्कूल, सहारनपुर

1919 · समाप्त

महासभा ने प्रधान महाराज सिंह की देखरेख में डी.आई.ओ.एस. कार्यालय के सामने स्थापित किया। मुल्तान सिंह वर्मा मई 1921 में इसके हैडमास्टर बने — छह अध्यापक, गूजर छात्र केवल दो। जून 1922 में यह स्कूल औपचारिक रूप से रामपुर मनिहारान में तब्दील हो गया। भूमिका: हैडमास्टर

प्राईमरी स्कूल तथा छात्रावास, रामपुर मनिहारान

जून 1922 – 1926 · समाप्त

मार्च 1922 के जैनबाग जलसे में “तजुर्बे के तौर पर” खोलने का निर्णय; किराये के मकान में स्कूल तथा किराये पर छात्रावास। 1926 में संस्था टूट गई — छात्रावास की चारपाई, लाइब्रेरी की पुस्तकें तथा फर्नीचर चौ. जयमल सिंह के यहाँ जमा किए गए। भूमिका: प्रधान-अध्यापक; जुलाई 1925 से कार्यभार लाला दुलीचन्द को।

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जहाँ पढ़ाया

1926–1935

डी.ए.वी. हाईस्कूल, मुजफ्फरनगर

भूगोल अध्यापक। छात्र जय कृष्ण गोपाल विशेष योग्यता से उत्तीर्ण — बाद में रूड़की विश्वविद्यालय के उप कुलपति। 1934 में इस्तीफा।

1934–1944

जाट स्कूल, मुजफ्फरनगर

चौ. शेर सिंह (सैदपुर, बुलन्दशहर) के आग्रह पर हैडमास्टर। चार वर्ष में यह स्कूल हाईस्कूल बना (1940)। 3 फरवरी 1944 को कार्यमुक्ति; जाते समय 500 रुपये देकर साधारण सभा की आजीवन सदस्यता ली।

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सभा के सहयोग से स्थापित

पुस्तिका के पृष्ठ 27 पर रामपुर मनिहारान के बाहर स्थापित पाँच संस्थाओं की सूची है। सभा की भूमिका वहाँ “सहयोग” कही गई है — संचालन नहीं — और किसी के आगे स्थापना-वर्ष नहीं दिया गया।

  1. महाराज सिंह गूजर जूनियर हाई स्कूल, खन्दराबली (शामली)
  2. गूजर जूनियर हाईस्कूल, गंगदासपुर (सहारनपुर)
  3. गूजर जूनियर हाईस्कूल, नल्हेड़ा (सहारनपुर)
  4. किसान जूनियर हाईस्कूल, भूरनी खतीरपुर
  5. जय भारत जूनियर हाईस्कूल, टोडरपुर

इनमें से किसी की स्थापना-तिथि इस अभिलेखागार में दर्ज नहीं है, अतः ये कालक्रम में नहीं आतीं। नल्हेड़ा का नाम चन्दे के प्रारम्भिक वायदों में भी मिलता है — सम्बन्ध की प्रकृति अभी अंकित नहीं।

झबरेड़ा कॉलेज

1982 · दान

धर्मपत्नी स्वर्गीया श्रीमती मलखानी देवी की स्मृति में 1100 रुपये का दान; उसी स्मृति में रामपुर कॉलेज को भी दान। भूमिका: दाता — स्थापना से सम्बन्ध पुस्तिका में नहीं बताया गया।

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भूमि तथा दान

रामपुर मनिहारान की संस्था किसी अनुदान से नहीं, दान की भूमि पर खड़ी हुई। 21 सितम्बर 1943 को श्रीमती पिरानी देवी तथा चौ. भरत सिंह ने देवबन्द जाकर 159 बीघे 15 बिस्से भूमि की रजिस्ट्री सभा के नाम कराई। पुस्तिका के अनुसार भूमि “डिग्री कॉलेज बनने तक” प्राप्त होती रही, अतः यह आँकड़ा प्रारम्भिक है, अन्तिम नहीं।

पुस्तिका में दर्ज छह दानकर्ता, रकबे के अवरोही क्रम में:

श्रीमती रानी रामकौर · भोगपुर572 बीघे 11 बिस्से
श्रीमती पिरानी देवी · रामपुर, किशन खेड़ी118 बीघे 3 बिस्से
श्रीमती प्रसन्नी देवी110 बीघे
श्रीमती मनोहरी · कांधला80 बीघे
चौ. भरत सिंह · रामपुर, किशन खेड़ी41 बीघे 10 बिस्से
लाला त्रिलोक चन्द जैन · रामपुर मनिहारान8 बीघे

केवल पहली रजिस्ट्री की तिथि अंकित है; शेष चार दानों की तिथि पुस्तिका में नहीं है, अतः क्रम रकबे का रखा गया है। पूरी तालिका, स्थिति-टिप्पणियों तथा योगफल की असंगति सहित, जीवन-वृत्त पर है।

चन्दे की पद्धति भी दर्ज है: 13 अगस्त 1944 की बैठक में तय हुआ कि सहारनपुर तथा मुजफ्फरनगर ज़िले के हर गाँव में शादी के मौके पर दोनों ओर से दान इकट्ठा किया जाए।

स्रोत

इस पृष्ठ की प्रविष्टियाँ पुस्तिका पृष्ठ 4–31 से हैं; सभा की स्थापना (13 जून 1943) तथा स्कूल के आरम्भ (1 नवम्बर 1943) की तिथियाँ प्रतिमा के शिलालेख से भी पुष्ट हैं। पूरा स्रोत-विवरण तथा प्रक्रियाधीन स्रोतों की सूची सन्दर्भ पृष्ठ पर।