Biography · जीवन-वृत्त
चौधरी मुल्तान सिंह वर्मा
यह पृष्ठ उनके जीवन का अभिलेख-आधारित विवरण है। प्रत्येक कथन के आगे उसका स्रोत अंकित है। जहाँ अभिलेख उपलब्ध नहीं है, वहाँ अनुमान नहीं लगाया गया — अनुभाग रिक्त छोड़ा गया है और अपेक्षित सामग्री का उल्लेख कर दिया गया है।
- जन्म
- 12 अगस्त 1900
पुस्तिका में ज्येष्ठ बदी दोज, संवत् 1954 · तदनुसार सन् 1897 - जन्मस्थान
- ग्राम नौगांवां, बेगुपुर मौजे, तहसील बेहट, ज़िला सहारनपुर
- माता-पिता
- चौधरी श्रीराम तथा श्रीमती कर्मवती (छापर बटारान)
- कार्यक्षेत्र
- शिक्षा संस्थाओं का निर्माण, रामपुर मनिहारान तथा ज़िला सहारनपुर
- निधन
- 16 जनवरी 1983
MSV-ARCH-PHO-001
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इस पृष्ठ का वर्तमान पाठ उस स्रोत से है जो सबसे पहले सूचीबद्ध हुआ — दो स्रोतों से — प्रतिमा का शिलालेख, तथा 1982 में संस्था के भीतर से लिखी गई पुस्तिका। जन्म-वर्ष पर दोनों में तीन वर्ष का अन्तर है; यहाँ शिलालेख की तिथि रखी गई है और पुस्तिका का पाठ मिटाया नहीं गया। स्रोतों का वर्गीकरण तथा सभी असंगतियाँ सन्दर्भ पृष्ठ पर। यह अभिलेखागार का प्रथम स्रोत है, एकमात्र नहीं। सभा के मूल प्रस्ताव, रजिस्ट्रेशन कागज़ात, देवबन्द की रजिस्ट्री तथा खतौनी, बोर्ड परिणाम, विश्वविद्यालय पत्राचार, समाचार-कतरन, पारिवारिक कागज़ात तथा समकालीनों की मौखिक गवाही संकलन में हैं; जैसे-जैसे वे जुड़ेंगे, प्रत्येक कथन की प्रमाण-स्थिति यहीं बदलेगी — पुष्टि हो या विरोध, दोनों दर्ज होंगे। साक्ष्य-क्रम
प्रारम्भिक जीवन
नौगांवां, बेहट कस्बे से लगभग छह किलोमीटर उत्तर की ओर बसा गाँव है। उस समय गाँव में चौधरी श्रीराम की बैठक पर एक पाधा बच्चों को पढ़ाता था, और ज़िला परिषद का चौथी कक्षा तक का एक प्राथमिक विद्यालय भी था। पुस्तिका के अनुसार इनमें उनके समुदाय का कोई बालक नहीं पढ़ता था।
बालक मुल्तान सिंह के हिस्से में गाय चराने का काम था। छह-सात वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी ही रुचि से दिन में आधा-एक घण्टा पाधा जी के पास बैठना शुरू किया — गाँव में अपने समुदाय के पहले बालक जो पढ़ने बैठे। कुछ समय बाद वे गम्भीर रूप से बीमार पड़े और घर के काम में लौटा दिए गए।
उनके ताऊ चौधरी शिवराज ने उन्हें ज़िला परिषद के प्राथमिक विद्यालय में दाखिल कराया, जहाँ से उन्होंने सन् 1910 में चौथी कक्षा उत्तीर्ण की।
परिवार
वे चौधरी श्रीराम के सबसे बड़े पुत्र थे। सरजीत, टोडर तथा सूरत सिंह उनके तीन छोटे भाई थे और चमेली नाम की एक छोटी बहन — पाँच भाई-बहन।
विवाह
मेरठ में इन्टर की पढ़ाई के दौरान उनका विवाह कुंजा गाँव (निकट चुड़ियाला) की एक कन्या के साथ सम्पन्न हुआ। सन् 1924 में उनकी धर्मपत्नी का स्वर्गवास हो गया। सन् 1926 में उनका पुनर्विवाह बाबुपुर नगली की श्रीमती मलखानी देवी के साथ हुआ।
अभिलेख अपेक्षित
पहली धर्मपत्नी का नाम, विवाह-वर्ष तथा सन्तान का विवरण पुस्तिका में नहीं आता। अपेक्षित: पारिवारिक अभिलेख, विवाह-निमंत्रण, वंश-विवरण।
शिक्षा
चौथी कक्षा के बाद उन्होंने छात्रवृत्ति परीक्षा दी और कैलाशपुर टाउन स्कूल, सहारनपुर के नाम से दो रुपये मासिक की छात्रवृत्ति मिली। विद्यालय नौगांवां से लगभग 25 किलोमीटर दूर था, इसलिए छात्रावास में रहना अनिवार्य हो गया; बोर्डिंग हाउस की फीस आठ आने थी और दाल-आटा घर से जाता था। इसी सहायता से छठी कक्षा उत्तीर्ण की, और अगली छात्रवृत्ति परीक्षा में तीन रुपये मासिक मिलने लगे।
उस समय छठी कक्षा के बाद जूनियर स्पेशल तथा सीनियर स्पेशल करके मिडिल परीक्षा दी जाती थी, जिसके लिए सहारनपुर या मुजफ्फरनगर जाना पड़ता था। तीन रुपये मासिक में यह कठिन था और घर की स्थिति पढ़ाई का खर्च उठाने की नहीं थी। इसी परिस्थिति में मुण्डलाना (ज़िला सहारनपुर) के प्रधान महाराज सिंह वर्मा से उनका परिचय हुआ, जिनके सहयोग से आगे की शिक्षा सम्भव हुई।
मुजफ्फरनगर
मुजफ्फरनगर के विद्यालय में उन्होंने जूनियर स्पेशल तथा सीनियर स्पेशल कक्षाएँ पास कीं और सन् 1915 में मिडिल अंग्रेजी परीक्षा उत्तीर्ण की। हाईस्कूल छात्रवृत्ति परीक्षा में भी सफल रहे और छह रुपये प्रतिमास की छात्रवृत्ति मिली; सभा ने भी छह रुपये प्रति माह स्वीकार किए। इस प्रकार सन् 1917 में उन्होंने हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की।
मुजफ्फरनगर में वे पूरे समय जाट बोर्डिंग हाउस में रहे, जहाँ सन्ध्या, हवन तथा आर्य समाज के संस्कार उन्हें मिले। पुस्तिका उस वर्ष की शैक्षिक स्थिति का माप इस वाक्य में देती है: उस वर्ष हाईस्कूल पास करने वाले वे अकेले गूजर छात्र थे।
मेरठ
1917 में हाईस्कूल के बाद वे रुड़की के थामसन इन्जीनियरिंग कालेज में ओवरसीयरी में प्रवेश पाना चाहते थे। उनके साथी गेन्दा प्रकाश ने बताया कि शामली में चौधरी मामराज सिंह के घर प्रधान महाराज सिंह यह कह रहे थे कि मुल्तान सिंह को कॉलेज भेजा जाए। उन्होंने तुरन्त प्रधान जी को पत्र लिखा; उत्तर तार से आया — “You will have to join College”। ओवरसीयर बनने का इरादा उन्होंने छोड़ दिया।
गवर्नमेंट हाईस्कूल, मुजफ्फरनगर के हैडमास्टर के माध्यम से आगरा कालेज तथा मेयर कालेज इलाहाबाद से पत्र-व्यवहार हुआ। इलाहाबाद से तार आया “No Vacancy”, आगरा से “Vacancy in Arts only” — और वे विज्ञान पढ़ना चाहते थे। विवश होकर उन्होंने मेरठ कॉलेज में दाखिला लिया।
महासभा की निर्धारित छात्रवृत्ति से काम चलाना कठिन था और घर की स्थिति शेष व्यय उठाने की नहीं थी। उन्होंने प्रधान महाराज सिंह को लिखा और उत्तर मिला — “सभा पूरा खर्चा देगी।” पुस्तिका के अनुसार उनके सारे वास्तविक खर्च का बिल सभा चुकाती रही।
उस समय मेरठ कमिश्नरी में मेरठ में ही एक मात्र कॉलेज था। वहाँ किराये पर एक गूजर छात्रावास चलता था जिसके मानिटर बोनड़ा निवासी रणजीत सिंह थे, पर वह कॉलेज से बहुत दूर था, अतः वे कॉलेज हॉस्टल में ही रहे। हाईस्कूल से ही उन्हें फुटबाल, कबड्डी तथा हॉकी का शौक था और वे मेरठ कॉलेज की प्रथम टीमों में रहे।
बनारस
जुड्डा निवासी श्री भिक्खन लाल आत्रेय, जो जूनियर स्पेशल से उनके साथ मुजफ्फरनगर में पढ़े थे, हाईस्कूल के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय चले गए थे। उनकी प्रेरणा से मुल्तान सिंह ने भी वहाँ दाखिला लेने का निश्चय किया। इसी समय प्रधान महाराज सिंह ने अपनी इच्छा प्रकट की कि उन्हें गूजर स्कूल चलाना है। उस इच्छा का आदर करते हुए उन्होंने बनारस में प्रवेश लिया, और चूँकि स्कूल चलाने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक था, विज्ञान विषय छोड़कर अंग्रेजी, अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र विषय ले लिए। यह विश्वविद्यालय पं. मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित किया गया था।
वैचारिक प्रभाव
सबसे स्पष्ट प्रभाव प्रधान महाराज सिंह का है। पुस्तिका के अनुसार उनका जन्म सन् 1886 में ग्राम मुण्डलाना, ज़िला सहारनपुर में हुआ; सत्संग के प्रभाव से उन पर ऋषि दयानन्द की गहरी छाप पड़ी और 22 वर्ष की आयु में ही वे बिरादरी में सुधारवादी के रूप में जाने जाने लगे।
प्रधान महाराज सिंह ने श्रीमती धर्मरक्षिणी गूजर क्षत्रिय महासभा, भारतवर्ष की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई। इस महासभा ने “गूजर हितकारी” नामक मासिक पत्रिका निकाली, जिसके सम्पादक गंगोह निवासी मुंशी कदम सिंह थे। महासभा ने एक निर्धन छात्रवृत्ति कोष भी स्थापित किया, जिससे निर्धन छात्रों को सहायता दी जाती थी।
मिडिल परीक्षा के गजट में नाम देखकर प्रधान महाराज सिंह ने कैलाशपुर स्कूल के हेडमास्टर श्री मौहम्मद हसन को लिखा कि मुल्तान सिंह को आगे पढ़ने के लिए चार रुपये प्रति माह की छात्रवृत्ति दी जा रही है। यह सूचना श्री हसन ने नौगांवां चौधरी श्रीराम तक भेजी। तभी प्रधान महाराज सिंह से उनका पहला परिचय हुआ। पुस्तिका, पृष्ठ 7 का सार
प्रधान महाराज सिंह का देहान्त 37 वर्ष की आयु में हुआ। पुस्तिका लिखती है कि उनका मिशन मुल्तान सिंह वर्मा ने सदा स्मरण रखा और उसे पूरा करने में लगे रहे।
दो और प्रभाव पुस्तिका में दर्ज हैं। मुजफ्फरनगर के जाट बोर्डिंग हाउस में मिले आर्य समाज के संस्कार, और जुड्डा निवासी श्री भिक्खन लाल आत्रेय, जिनकी प्रेरणा से वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय पहुँचे।
सार्वजनिक कार्य में प्रवेश
सन् 1921 में उन्होंने बी.ए. परीक्षा उत्तीर्ण की। इससे पहले, सन् 1919 में महासभा ने प्रधान महाराज सिंह की देखरेख में सहारनपुर में डी.आई.ओ.एस. कार्यालय के सामने एक गूजर स्कूल स्थापित किया था। मान्यता के लिए हुए मुआयने में अंग्रेज इन्सपैक्टर ने हैडमास्टर के कमरे में गांधी तथा नेहरू के चित्र देखे और नाराज होकर रिपोर्ट में लिखा — “A Blind man is Leading the blinds”। मान्यता खटाई में पड़ गई।
मई 1921 में प्रधान जी ने बनारस पत्र लिखा कि परीक्षा देते ही स्कूल में आकर हैडमास्टर का चार्ज ले लो — अन्तरंग सभा ने नियुक्ति कर दी है। उन्होंने वैसा ही किया। धन के अभाव में उन्होंने छह छात्रों के साथ ढमोले से फूँस ढोया और स्वयं छप्पर बाँधे। उस स्कूल में छह अध्यापक थे, छात्र अधिकतर गैर-गुर्जर थे और गूजर छात्र केवल दो।
इन्सपैक्टर टिपल के निरीक्षण से छठी कक्षा हिन्दी तक की मान्यता मिली और सातवीं कक्षा खोलने की अनुमति भी। इसी काल में खदरी के जेलदार चौ. इमरत सिंह तथा ईस्माईलपुर के जेलदार चौ. भिक्खू सिंह उनके पास यह प्रस्ताव लेकर आए कि अम्बाला के अंग्रेज डी.सी. ने कहा है, कोई लड़का ग्रेज्युएट हो तो उसे डिप्टी कलेक्टर नियुक्त कर लेंगे। उनका उत्तर दो टूक था — “मुझे आप लोगों ने जाति की सेवा के लिए तैयार किया है। मैं इस कार्य को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता।”
जनवरी 1922 में प्रधान महाराज सिंह का देहान्त हो गया। पुस्तिका के अनुसार अन्त समय उन्होंने कहा — “मेरा स्कूल तुम्हारा ही स्कूल है, संभालो।” मार्च 1922 में जैनबाग, रामपुर मनिहारान में धाऊ रघुबीर सिंह (बजीर, महाराजा भरतपुर) की अध्यक्षता में महासभा का जलसा हुआ, जिसमें अन्तरंग सभा का चुनाव हुआ — प्रधान धाऊ बख्शी रघुबीर सिंह भरतपुर, महासचिव प्रधान भोपाल सिंह मुण्डलाना, संयुक्त सचिव श्री मंगत सिंह दूधला, खजांची चौ. लेखा सिंह पहांसू।
उसी आम जलसे में यह भी तय हुआ कि सहारनपुर के गूजर स्कूल से गूजर छात्रों को कोई लाभ नहीं है, अतः तजुर्बे के तौर पर रामपुर मनिहारान में एक प्राईमरी स्कूल खोलकर देखा जाए। जून 1922 में वर्तमान जैन कन्या इण्टर कॉलेज, रामपुर मनिहारान के सामने वाले मकान को किराये पर लेकर स्कूल खोला गया, और सहारनपुर का स्कूल औपचारिक रूप से रामपुर मनिहारान में तब्दील कर दिया गया। छात्रावास भी किराये पर लिया गया।
1924–25 के सत्र में सभा का कोष खाली हो गया और वे चौ. जयमल सिंह के साथ चन्दे के लिए क्षेत्र में निकल पड़े। पुस्तिका इस प्रसंग में चकवाली गाँव की एक बुढ़िया का उल्लेख करती है, जिसने बर्तन गिरवी रखकर चन्दा दिया।
स्थाई प्रधानाध्यापक बनने के लिए एल.टी. करना आवश्यक था, अतः जुलाई 1925 में वे सढ़ौली हरिया के लाला दुलीचन्द को प्रधान-अध्यापक का कार्यभार सौंपकर बनारस चले गए। उनकी अनुपस्थिति में स्कूल की स्थिति बिगड़ती गई; 1925–26 के सत्र के लिए बुलाए गए महासभा के जलसे में बहुत कम लोग आए। निदान यह संस्था सन् 1926 में टूट गई। छात्रावास की चारपाई, लाइब्रेरी की पुस्तकें तथा फर्नीचर चौ. जयमल सिंह के यहाँ जमा कर दिए गए।
इसके बाद वे मुजफ्फरनगर लौटे और डी.ए.वी. हाईस्कूल में भूगोल अध्यापक नियुक्त हुए, जहाँ 1935 तक रहे। उनका एक छात्र जय कृष्ण गोपाल विशेष योग्यता से उत्तीर्ण हुआ और बाद में रूड़की विश्वविद्यालय के उप कुलपति रहे। 1934 में चौ. शेर सिंह (सैदपुर, बुलन्दशहर) के जाट स्कूल में हैडमास्टर बनने के आग्रह पर उन्होंने डी.ए.वी. से इस्तीफा दिया। दिसम्बर 1935 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.ए. (भूगोल) की प्राइवेट परीक्षा दी — उस समय पूरे भारत में केवल वहीं भूगोल में एम.ए. था — और लौटते समय विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी को सौ रुपये दान दे आए, जबकि उनका वेतन 75 रुपये प्रति माह था। जुलाई 1936 में एम.ए. उत्तीर्ण किया। सन् 1940 में उन्होंने जाट स्कूल, मु.नगर को चार वर्ष के अल्प काल में हाईस्कूल बनवा दिया, और उसी वर्ष गाजियाबाद में हुए गूजर महासभा के अधिवेशन में महासभा का खजांची नियुक्त हुए — इस पद पर 1955 तक रहे।
शिक्षा-मिशन
पुस्तिका के अनुसार यह मिशन उन्हें सौंपा गया था। बनारस जाने के समय प्रधान महाराज सिंह ने अपनी इच्छा स्पष्ट कर दी थी कि उन्हें गूजर स्कूल चलाना है — और इसी कारण उन्होंने विज्ञान छोड़कर अंग्रेजी, अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र लिए, क्योंकि स्कूल चलाने के लिए अंग्रेजी आवश्यक थी। विषय-चुनाव का यह निर्णय बताता है कि संस्था बनाने का उद्देश्य पढ़ाई पूरी होने से पहले ही तय था।
जिस क्रम में उनका जीवन चला — छात्रवृत्ति से पढ़ाई, छात्रवृत्ति कोष चलाने वाली महासभा से जुड़ाव, फिर संस्थाओं का निर्माण — वही इस मिशन का ढाँचा है। विस्तृत विवेचन शिक्षा-दृष्टि पृष्ठ पर।
अपेक्षित
भाषण, पत्र अथवा लेख जिनमें उन्होंने अपने शब्दों में शिक्षा-सम्बन्धी विचार रखे हों। ऐसी सामग्री मिलने पर उद्धरण के रूप में यहाँ दी जाएगी।
रामपुर मनिहारान में कार्य
गूजर विद्या प्रचारिणी सभा की स्थापना — 13 जून 1943
जाट हाईस्कूल, मु.नगर में उनसे पढ़ने वाले और उनके ही मकान में रहने वाले छात्र — मोहकम सिंह टिकौला, धीरज सिंह नारसन आदि — बार-बार गूजर स्कूल खोलने की बात कहते रहे। छात्रों का आग्रह था कि कम से कम मु.नगर में गूजर छात्रावास अवश्य खुलना चाहिए। 1942–43 का सत्र इसी सोच में बीता, और उन्होंने रजिस्टर्ड सभा बनाने का निश्चय किया। इस हेतु 13 जून 1943 को अपने निवास स्थान नई मण्डी, मु.नगर पर एक बैठक बुलाई जिसमें 15 व्यक्ति उपस्थित हुए।
इस बैठक में “गूजर विद्या प्रचारिणी सभा, मु.नगर – सहारनपुर सर्किल” स्थापित की गई। नियमावली मुल्तान सिंह वर्मा ने पहले ही तैयार कर रखी थी और वह ज्यों की त्यों पास कर दी गई। सभा को एक महीने के भीतर सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट नं. 21 सन् 1860 के अन्तर्गत पंजीकृत करा लिया गया।
प्रस्ताव सं. 5 · अन्तरंग सभा 1943–44
- प्रधान
- चौ. जवान सिंह — बीनड़ा
- उप प्रधान
- प्रधान प्रताप सिंह — मुण्डलाना
- मन्त्री
- श्री मुल्तान सिंह, हैडमास्टर, जाट हाई स्कूल, मु.नगर
- उप मन्त्री
- चौ. सुखबीर सिंह — मांडला
- कोषाध्यक्ष
- चौ. विशम्भर सिंह मुनीम — सिसौना
सभासद: चौ. अंतर सिंह (ऊँचा गाँव), चौ. नत्थू सिंह (पाल), चौ. भिक्कन सिंह (सिला जुड्डी), चौ. मूला सिंह (शेर नगर–मुस्सा), चौ. मलखान सिंह (अलीपुर), बुध सिंह (शेरनगर–मुस्सा), खड़क सिंह (भूरनी), आशा राम (रामपुर मनिहारान), सुलतान सिंह (कैराना), पृथ्वी सिंह (नारसन खुर्द)। इसी बैठक में जुलाई 1943 से नई मंडी, मु.नगर में किराये के मकान में गूजर छात्रावास खोलने का निश्चय हुआ, और वह खुल गया।
रामपुर के स्कूल की स्थापना — 1 नवम्बर 1943
10 अगस्त 1943 को उनके मकान पर हुई अन्तरंग सभा की बैठक में प्रस्ताव सं. 9 के अन्तर्गत तय हुआ कि 12 सितम्बर 1943 को रामपुर मनिहारान में चौ. आशा राम की चौपाल पर बैठक बुलाई जाए। 12 सितम्बर 1943 को सायं 3 बजे वह बैठक हुई, जिसमें अम्बाला, सहारनपुर तथा मु.नगर ज़िले के अनेक प्रमुख लोगों ने भाग लिया। चौ. दीप सिंह लक्सर के प्रभाव तथा चौ. भरत सिंह रामपुर मनिहारान की दानशीलता और विशेष प्रयास से भूमि प्राप्त हुई।
धर्मपत्नी स्वर्गीय राजा बलवन्त सिंह, लढ़ौरा
विधवा, स्वर्गीय चौ. धूम सिंह
मौजा किशन खेड़ी 68 बीघे
धर्मपत्नी स्वर्गीय चौ. इन्द्र सिंह, रामपुर
धर्मपत्नी चौ. चौहल सिंह, कांधला, ज़िला शामली
रामपुर मनिहारान
मौजा किशन खेड़ी 16 बीघे
रईस, रामपुर मनिहारान
तालिका पर टिप्पणी
यह तालिका पुस्तिका की दो पृथक सूचियों को एक जगह, रकबे के अवरोही क्रम में रखती है — पृष्ठ 18 की वह सूची जिसकी रजिस्ट्री 21 सितम्बर 1943 को हुई, तथा आगे दर्ज वे दान जो पुस्तिका के अनुसार “डिग्री कॉलेज बनने तक” मिलते रहे। क्रम रकबे का है, तिथि का नहीं, क्योंकि चार प्रविष्टियों की तिथि पुस्तिका में अंकित नहीं है। पृष्ठ 18 की सूची का मुद्रित कुल 159 बीघे 15 बिस्से केवल पहली दो पंक्तियों का है; छहों पंक्तियों का कोई कुल पुस्तिका नहीं देती, अतः यहाँ भी नहीं जोड़ा गया।
छह दानकर्ताओं में चार महिलाएँ हैं, और सबसे बड़ा रकबा भी एक महिला का है — यह तथ्य तालिका में दिखता है, पुस्तिका के विवरण में नहीं, जहाँ इनमें से किसी का परिचय पति अथवा स्वर्गीय पति के नाम से आगे नहीं जाता।
पूर्व में अस्पष्ट रही “विधवा” वाली पंक्ति अब पढ़ी जा चुकी है: वह पृथक दानकर्ता नहीं, श्रीमती पिरानी देवी का परिचय है — विधवा, स्वर्गीय चौ. धूम सिंह। बिस्से की संख्याएँ उनकी पंक्ति के नीचे मुद्रित हैं।
मुद्रित योगफल आपस में मेल नहीं खाते। आँकड़े जैसे मुद्रित हैं वैसे ही रखे गए हैं — सुधार नहीं किया गया; गणना का पूरा विवरण असंगति-सूची में है।
21 सितम्बर 1943 को श्रीमती पिरानी देवी तथा चौ. भरत सिंह ने देवबन्द जाकर उपर्युक्त भूमि की रजिस्ट्री गूजर विद्या प्रचारिणी सभा के नाम कर दी।
इसके बाद चन्दे का काम शुरू हुआ। सर्वप्रथम डेपुटेशन चौ. मूला सिंह हंगावली के पास गया, जिन्होंने एक कमरे के लिए तीन हजार रुपये देने का वायदा किया; इसी प्रकार नल्हेड़ा के चौ. सुनेहरा सिंह तथा भाँकला से भी तीन-तीन हजार के वायदे मिले, और जन्देहेड़ा गाँव ने भी 3000 रुपये कमरे के लिए देने का वायदा कर कुछ धन नकद दिया। 31 अक्तूबर 1943 को वे जौंड़खेड़ा पहुँचे, और उसी दिन सायंकाल रामपुर आकर आर्य समाज मन्दिर में यज्ञ किया। अगले दिन, 1 नवम्बर 1943 को गूजर ऐंग्लो वैदिक स्कूल, रामपुर मनिहारान के नाम से स्कूल का शुभारम्भ हुआ। प्रवेश पाने के लिए 12 छात्रों के नाम आए, और श्री राधेश्याम गुप्ता, श्री दुली चन्द तथा श्री होराम सिंह — तीन अध्यापक उसी दिन अस्थायी तौर पर नियुक्त कर लिए गए।
इसके बाद उन्होंने जाट हाईस्कूल, मु.नगर से त्याग-पत्र दिया। इस्तीफा पहले स्वीकार नहीं हुआ; अन्तत: 3 फरवरी 1944 को उन्हें कार्यमुक्त किया गया। जाते समय उन्होंने 500 रुपये देकर जाट हाईस्कूल, मु.नगर की साधारण सभा की आजीवन सदस्यता ले ली।
4 फरवरी 1944 को रामपुर पहुँचकर उन्होंने पाया कि स्कूल चलाने का उत्साह घट गया है। उन्होंने चौ. आशा राम के मकान पर भूख हड़ताल शुरू कर दी — दो दिन बिना खाए-पिए बैठे रहने पर लोग एकत्र हुए और चन्दे का काम फिर चल पड़ा। 13 फरवरी 1944 की अन्तरंग सभा की बैठक में इमारत का निर्माण शुरू करने का निश्चय हुआ; भवन के नक्शे के लिए उन्होंने अपने शिष्य श्री जय प्रकाश गोयल, इन्जीनियर को थामसन कालेज रूड़की से बुलाकर परामर्श किया — एक कमरे का निर्माण-व्यय तीन हजार तथा छात्रावास के कमरे का एक हजार रुपये आँका गया। उसी बैठक में उन्हें 14 फरवरी 1944 से गूजर ऐंग्लो वैदिक स्कूल का मुस्तकिल हैडमास्टर नियुक्त किया गया।
13 अगस्त 1944 की बैठक में तय हुआ कि सहारनपुर तथा मुजफ्फरनगर ज़िले के हर गाँव में शादी के मौके पर दोनों ओर से कुछ न कुछ दान इकट्ठा किया जाए। तीसरी से आठवीं तक कक्षाएँ प्रारम्भ कर दी गईं और मान्यता भी ले ली गई। सभा के आजीवन तेरह सदस्यों की पहली स्वीकृत सूची में उनका नाम था। उस वर्ष कक्षाओं में एक सौ बासठ छात्र हो गए।
चन्दे की पद्धति
भूमि दान में मिली, परन्तु इमारत चन्दे से बननी थी। पुस्तिका चन्दे को प्रसंगवश नहीं, पद्धति के रूप में दर्ज करती है — किसके पास पहले जाया जाए, किस इकाई में वायदा लिया जाए, और वसूली कब की जाए। 13 फरवरी 1944 की बैठक में निर्माण-व्यय की इकाई तय हुई: एक कमरा तीन हजार रुपये, छात्रावास का कमरा एक हजार। इसके बाद चन्दा रुपयों में नहीं, कमरों में माँगा गया।
डेपुटेशन का क्रम भी सोचकर तय किया गया। पुस्तिका के अनुसार लोगों ने मिल बैठकर विचार किया कि सबसे पहले चन्दा किससे माँगने चला जाए; चौ. मूला सिंह हंगावली दारोगा जी के रिश्तेदार थे, अत: सर्वप्रथम डेपुटेशन उनके पास गया। मुजफ्फरनगर की सर्विस में रहते हुए भी वे छुट्टी लेकर डेपुटेशन ले जाते रहे।
प्रारम्भिक वायदे
यह सूची प्रारम्भिक डेपुटेशनों की है, सम्पूर्ण चन्दा-सूची नहीं। पुस्तिका आगे के दानकर्ताओं के नाम इस क्रम में नहीं देती; वायदा और वास्तविक वसूली का अन्तर भी उसमें दर्ज नहीं है। सभा के रोकड़-बही तथा रसीद-बुक से सत्यापन शेष
चन्दे के तीन और तरीके पुस्तिका में मिलते हैं। 13 अगस्त 1944 की बैठक में तय हुआ कि सहारनपुर तथा मुजफ्फरनगर ज़िले के हर गाँव में शादी के मौके पर दोनों ओर से दान इकट्ठा किया जाए — यानी चन्दा एक बार का अनुदान नहीं, विवाह-प्रसंग से जुड़ी नियमित वसूली बना। दूसरा तरीका यज्ञ तथा जलसों के साथ चलने वाला संग्रह था, जैसा 31 अक्तूबर 1943 को जौंड़खेड़ा से लौटकर आर्य समाज मन्दिर में हुआ। तीसरा दबाव व्यक्तिगत था: 4 फरवरी 1944 को उत्साह घटा पाकर उन्होंने चौ. आशा राम के मकान पर दो दिन की भूख हड़ताल की, जिसके बाद लोग एकत्र हुए और चन्दे का काम फिर चल पड़ा।
इसी पद्धति का एक पूर्व उदाहरण 1924–25 का है, जब सभा का कोष खाली था और वे चौ. जयमल सिंह के साथ चन्दे के लिए क्षेत्र में निकले। पुस्तिका के अनुसार चकवाली गाँव की एक बुढ़िया ने अपने बर्तन गिरवी रखकर चन्दा दिया।
हाईस्कूल, इण्टर तथा डिग्री कक्षाएँ
1945 का मिडिल बैच पास होने पर हाईस्कूल की चिन्ता हुई। श्रीमती पिरानी देवी द्वारा दान में दी गई भूमि पर कच्ची मिट्टी के 7 कमरे बनाकर उन पर फूँस डलवा दी गई, और जुलाई 1945 से स्कूल आर्य समाज के भवन से इन सात कमरों में आ गया। सत्र 1946–47 में नवीं कक्षा खोलने की अनुमति मिली। सन् 1948 में हाईस्कूल का प्रथम बैच निकला, जिसका परिणाम शत-प्रतिशत रहा।
जुलाई 1949 में आर्ट तथा कृषि में ग्यारहवीं खोलने की स्वीकृति मिली। 1951 में इण्टर का पहला बैच निकला; उसी वर्ष विज्ञान की मान्यता लेकर विज्ञान की ग्यारहवीं कक्षा भी चला दी गई, जिसका पहला बैच 1953 में निकला। 23 मई 1952 को संस्थापक प्रधान चौ. जवान सिंह बीनडा के स्थान पर पहांसू निवासी चौ. धर्म सिंह प्रधान नियुक्त हुए, जिन्होंने कहा — “प्रिंसिपल साहब, अब आप कॉलेज की देखरेख करो, जितना पैसा आपको चाहिये, हम लाकर देंगे।” 1957 तक कॉलेज की E शक्ल पूरी हो गई।
डिग्री कॉलेज: इण्टर कॉलेज अपने पैरों पर खड़ा हो जाने के बाद, अवकाश-प्राप्ति से पहले डिग्री कॉलेज खोलना उन्होंने आवश्यक समझा। सन् 1958 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय को कॉलेज सम्बद्ध कराने हेतु प्रार्थना-पत्र भिजवाया। एक बार उप कुलपति के नैनीताल आने की सूचना पाकर वे तत्कालीन प्रधान चौ. जवान सिंह को लेकर वहीं मिलने गए। जुलाई 1959 से कृषि में डिग्री कक्षाएँ खोलने की अनुमति उप कुलपति ने दे दी।
सभा के सहयोग से रामपुर मनिहारान के बाहर स्थापित संस्थाएँ · पृष्ठ 27
- महाराज सिंह गूजर जूनियर हाई स्कूल, खन्दराबली (शामली)
- गूजर जूनियर हाईस्कूल, गंगदासपुर (सहारनपुर)
- गूजर जूनियर हाईस्कूल, नल्हेड़ा (सहारनपुर)
- किसान जूनियर हाईस्कूल, भूरनी खतीरपुर
- जय भारत जूनियर हाईस्कूल, टोडरपुर
पुस्तिका के अनुसार भूमि डिग्री कॉलेज बनने तक प्राप्त होती रही। इन बाद के दानकर्ताओं — लाला त्रिलोक चन्द जैन, श्रीमती प्रसन्नी देवी, श्रीमती रानी रामकौर तथा श्रीमती मनोहरी — के रकबे ऊपर दान में प्राप्त भूमि की तालिका में, पृष्ठ 18 की प्रविष्टियों के साथ ही दर्ज हैं। संस्थागत दृष्टि से यही विवरण संस्थाएँ पृष्ठ पर भी है।
समुदाय तथा समाज से सम्बन्ध
पुस्तिका उनके कार्य को गुर्जर समुदाय में शिक्षा के प्रसार के सन्दर्भ में रखती है, और महासभा के सुधार-कार्यक्रम का भी उल्लेख करती है — जिसमें कुरीतियों के विरुद्ध प्रचार के लिए उपदेशक भेजे जाते थे।
यह संग्रह इस कार्य को किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं मानता। जिन लोगों ने भूमि दी, चंदा दिया, पढ़ाया और प्रबंध किया, उनका अलग अभिलेख शिक्षा आंदोलन तथा सहयोगी व्यक्ति पृष्ठों पर रखा जाता है।
उत्तर जीवन
नियमानुसार उन्हें सन् 1960 में अवकाश प्राप्त करना था, परन्तु प्रबन्ध समिति ने सरकार से सेवा-काल तीन वर्ष और बढ़ाने की माँग की; सरकार ने दो वर्ष दिए। इस प्रकार 30 जून 1962 को वे प्रधानाचार्य पद से मुक्त हुए। उत्तराधिकारी के प्रश्न पर प्रधान चौ. धर्म सिंह के पूछने पर उनका उत्तर था — बाबू संग्राम सिंह।
अवकाश के बाद भी वे संस्था के कार्यों में सम्मिलित रहे और डिग्री कॉलेज के छात्रों को धर्म एवं संस्कृति विषय पढ़ाते रहे। इसी काल में योगाभ्यास की ओर उनकी रुचि रही; एक रात प्राणायाम के बाद उन्हें हाई ब्लड प्रैशर का दौरा पड़ा। पुस्तिका के अनुसार सन् 1982 में उन्होंने अपनी धर्मपत्नी स्वर्गीया श्रीमती मलखानी देवी की स्मृति में रामपुर कॉलेज तथा झबरेड़ा कॉलेज (1100 रुपये) को दान दिया।
निधन — 16 जनवरी 1983
तिथि प्रतिमा के शिलालेख से। पुस्तिका इसका उल्लेख नहीं करती — वह उनके जीवनकाल में, निधन से आठ महीने पूर्व लिखी गई थी।
निधन की परिस्थितियों तथा समकालीन प्रतिक्रिया के लिए अपेक्षित: श्रद्धांजलि प्रकाशन, समाचार-कतरन, संस्था का शोक-प्रस्ताव। प्रतिमा का अनावरण इसके लगभग सवा वर्ष बाद, 2 अप्रैल 1984 को हुआ।
समकालीनों की स्मृति
पूर्व छात्रों, अध्यापकों और गाँव के वरिष्ठजनों की स्मृतियाँ मौखिक इतिहास अनुभाग में दर्ज की जाती हैं। ऐसी स्मृति मौखिक साक्ष्य है — वह दस्तावेज़ी प्रमाण के बराबर स्वतः नहीं मानी जाती, और यहाँ उसे उसी रूप में चिह्नित किया जाता है।
पुस्तिका में कुछ प्रसंग तत्कालीन अध्यापकों के कथन के रूप में दर्ज हैं। निर्माण-कार्य में वे गर्डर आदि उठाने में स्वयं लग जाते थे; घाटहेड़ा में स्कूल को दान में मिली एक बगीची की लकड़ियाँ ढोई जा रही थीं और एक भारी लकड़ी नहीं उठ रही थी, तब उन्होंने हाथ लगाकर जोर से कहा — “उठाओ”।
आय बढ़ाने के लिए स्कूल में स्वांग कराने का सुझाव उन्होंने स्पष्ट अस्वीकार किया — “हमने लोगों को स्वांग आदि कराने से रोकने के लिए ही तो यह स्कूल खोला है।” हिसाब में 500 रुपये कम पड़ जाने पर उन्होंने अपनी धर्मपत्नी के नाम बैंक में जमा जेवर बेचकर रखा धन निकालने का फार्म भरा; आनाकानी होने पर कहा — “तुझे धन प्यारा है या मैं, यह मेरी ईमानदारी का प्रश्न है।”
पुस्तिका यह भी दर्ज करती है कि डेपुटेशन पर जाने के दौरान उनके एक पुत्र की निमोनिया से मृत्यु हो गई, और लौटने तक बच्चा उनसे बिछुड़ चुका था।
वर्गीकरण
ऊपर के प्रसंग पुस्तिका में स्मृति और प्रशंसा की भाषा में आते हैं। यह संग्रह इन्हें एक परवर्ती प्रकाशन में दर्ज वृत्तान्त मानता है, स्वतंत्र दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं। स्वतंत्र मौखिक साक्ष्य मौखिक इतिहास अनुभाग में अलग दर्ज किया जाएगा।
अवदान
पुस्तिका के अनुसार लेखन-कार्य भी उनके अवदान का हिस्सा है। एक छात्र श्री धर्मपाल सिंह, ढ़यकी निवासी, देहरादून कॉलेज में पढ़ने गए तो वहाँ इतिहास के प्रोफेसर ने कहा कि गूजरों का कोई इतिहास नहीं है; उन्होंने यह पत्र लिखकर भेजा। उत्तर में मुल्तान सिंह वर्मा ने के.एम. मुंशी रचित “The Glory that was Gujardesa” तथा “The Imperial Gurjara-Pratiharas” का हवाला दिया और गूजर इतिहास लिखने का निश्चय किया। पुस्तिका बताती है कि इस लेखन में वे इतने तल्लीन रहे कि उनके मकान से 15,000 रुपये के जेवर चोरी चले गए और उन्हें पता न चला। इसके अतिरिक्त चार पुस्तकें उनके नाम दर्ज हैं: Physical Geography; A Ground work of General English; High School Grammer; तथा सरल विवाह संस्कार बोधिनी।
पुस्तिका के अन्तिम पृष्ठों के अनुसार, लेखन के समय इस संस्था में डिग्री स्तर तक लगभग आठ हजार छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, और जन साधारण उन्हें इस क्षेत्र का मदन मोहन मालवीय मानता था।
जो संस्थाएँ आज चल रही हैं, वही इस कार्य का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। उनमें किसकी क्या भूमिका थी, यह प्रश्न अभिलेख से तय होता है — इसीलिए इस संग्रह में संस्थाओं का इतिहास और विवादित कथनों की जाँच अलग-अलग रखी गई है। ऐतिहासिक दावे
स्रोत
इस पृष्ठ का विवरण ओम प्रकाश गांधी की पुस्तिका, पृष्ठ 4–31 से है; जन्म तथा निधन की तिथियाँ प्रतिमा के शिलालेख से। स्रोतों का पूरा विवरण — लेखक की स्थिति, रचना-विधि, वर्गीकरण, तथा जिन बिन्दुओं पर दोनों टकराते हैं — सन्दर्भ पृष्ठ पर एक जगह दर्ज है।